घर मत भूल जाना......

सुना है तुम बड़े हो गये,
अच्छा है,,पर घर मत भूल जाना..

जहाँ माँगी थी मन्नत रो रोकर,
जहाँ सम्भले थे,सब कुछ खोकर,
उस विधाता का,
वो दर मत भूल जाना.....

फ़टी तकिया,टूटी खाट,
आसमान के नीचे ,वो ठंढी रात,
बिना बिछौने का,
बिस्तर मत भूल जाना......

पड़ोसी का नमक,उधारी का आँटा,
सिर का पसीना,पैरों का काँटा,
एक जोड़ कपड़े की,
बसर मत भूल जाना......

गालों की झुर्री,निगाँहों का दुखड़ा,
हिस्से का अपनी,वो रोटी का टुकड़ा,
समय का किया वो,
क़हर मत भूल जाना...

वो दर-दर की ठोकर,अमीरों की बातें,
फ़रेबी का छल, और दलालों की लातें,
बहा आँख से जो,ठिठक कर कभी वो,
ज़हर मत भूल जाना,
घर मत भूल जाना............

              कवि सिद्धार्थ अर्जुन

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