मांस क्यों नहीं खाना चाहिये...

*क्यों नहीं खाना चाहिये मांस......?*

      हमने पहले भी कह रखा है कि *यदि किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व का पता लगाना है तो ज़्यादा कुछ जानने की ज़रूरत नहीं है सिर्फ़ आप उस व्यक्ति का "आचार" अर्थात रहन-सहन और "आहार" अर्थात "भोजन" पता कर लीजिये।
यहाँ पर हम मुख्य रूप से "आहार" की बात करेंगे..
एक घटना हमें याद आती है जो मैं बताता हूँ आप सबको,एक बार किसी सज्जन ने हमसे बताया कि हर प्राणी के अंदर स्वाभाविक रूप से एक "जीवात्मा" होती है और यह जीवात्मा परम पिता परमेश्वर का *अंश* होती है इस हिसाब से दुनिया के किसी भी कोने में पैदा होने वाला जीव जन्म से देवत्व से परिपूर्ण होता है अर्थात उसका जो मूल लक्षण होता है वह *इंसानियत,प्रेम,और सद्व्यवहार* से भरा होता है परंतु चूँकि जीव परा प्रकृति है,परा प्रकृति का मतलब है ईश्वर द्वारा बनायी गयी वह प्रकृति जो सदैव अपने आपको विकास या पतन की ओर ले जाने को तत्पर रहे,अब जीव में यह गुण होता है अतः वह परा प्रकृति है एक बात और यहीं पर स्पष्ट कर दूँ की यहाँ पर हमने जीव शब्द का प्रयोग सिर्फ़ मानव जाति के लिये ही किया है अतः किसी भी सज्जन के मानस में कोई संदेह नहीं होना चाहिये।
ख़ैर बात चल रही थी जीव के मूल लक्षण की कि हर जीव जन्म से देवताओं के सद्गुणों से भरा होता है,परंतु जैसा की आदरणीय कवि तुलसीदास जी ने लिखा है कि,
"कर्म प्रधान विश्व रचि राखा।"
"जो जस करई,सो तस फलु चाखा।।"

अर्थात यह विश्व कर्म के आधार पर चलता है और जो जैसा कर्म करता है उसे वैसा फल भोगना पड़ता है।
अब व्यक्ति कर्म करे इसके लिये उसे ऊर्जा की आवश्यकता होती है और ऊर्जा उसे भोजन से मिलती है।
उन सज्जन ने हमें बताया कि भोजन दो प्रकार का होता है एक तो शाक और दूसरा माँस मदिरा,
अब भोजन के अनुसार जीव भी दो प्रकार के एक तो शाकाहारी और एक मांसाहारी,अच्छा अब यह तो आप जानते ही होंगे कि इतिहास में जितने भी दिव्य पुरुष हुए हैं सब के सब शाकाहारी थे।और जितने भी दुष्ट जीव इतिहास में हैं सब के सब मांस मदिरा से ग्रसित हैं।
चाहे आप विवेकानन्द जी को ले लीजिये चाहे तो किसी अन्य को और इतना ही नहीं इस्लाम धर्म के संस्थापक पैगंबर मोहम्मद साहब ने भी आजीवन कभी मांस का सेवन नहीं किया ।पाक़ क़ुरान में लिखा गया,करूणावान अल्लाह कहते है-
"न उनके मांस अल्लाह को पहुंचते हैं और न उनके रक्त। किंतु उसे तुम्हारा तक्वा (धर्मपरायणता) पहुंचता है।"

(क़ुरआन -22: 37)

"धरती में चलने-फिरनेवाला कोई भी प्राणी हो या अपने दो परो से उड़नवाला कोई पक्षी, ये सब तुम्हारी ही तरह के गिरोह है। हमने किताब में कोई भी चीज़ नहीं छोड़ी है। फिर वे अपने रब की ओर इकट्ठे किए जाएँगे।"
सिर्फ़ यही नहीं,आगे भी देखिये,
 इस्लाम के सूफी संत मौलाना रूमी ने अपनी मसनवी में मुसलमानों को अहिंसा का उपदेश दिया है, वह कहते हैं,

"मी आजार मूरी कि दाना कुशस्त, कि जां दारद औ जां शीरीं खुशस्त"

अर्थात - तुम चींटी को भी नहीं मारो, जो दाना खाती है, क्योंकि उसमे भी जान है, और हरेक को अपनी जान प्यारी होती है.

हजरत रसूल अल्लाह सलल्लाह अलैह व वसल्लम ताकीदन फरमाते हैं कि जानदार को जीने व दुनिया में रहने का बराबर व पूरा हक है | ऐसा कोई भी आदमी है जो एक गौरैयां से छोटे कीड़े की भी जान लेता है तो खुदा उससे इसका हिसाब लेगा और वह इन्सान जो एक नन्हीं सी चिड़िया पर भी रहम करता है , उसकी जान बचाता है, अल्लाह कयामत के दिन उस पर रहम करेगा |
अन्य भी बहुत से उदाहरण हैं  जिनके लिये आप विभिन्न धर्म पुस्तकें पढ़ सकते हैं चाहे वह कबीर दास जी से सम्बंधित हों या किसी अन्य से कबीर दास जी ने भी एक जगह कहा कि,

वे रोजे भी व्यर्थ और निष्फल है जिनको रखने वाला जिहवा के स्वाद के वश हो कर जीवों का घात करता है । इस प्रकार अल्लाह खुश नहीं होगा ।

*रोजा धरै मनावै अलहु, सुआदति जीअ संघारै ।*
*आपा देखि अवर नहीं देखें काहे कउ झख मारै ।*
और भी यदि दृष्टिपात करें तो देखेंगे कि,
लंदन मस्जिद के इमाम अल हाफिज बशीर अहमद मसेरी ने अपनी पुस्तक *इस्लामिक कंसर्न अबाउट एनीमल* में मजहब के हिसाब से पशुओं पर होने वाले अत्याचारों पर दु :ख प्रकट करते हुए पाक *कुरान* *मजीद* व *हजरत मोहम्मद साहब* के कथन का हवाला देते हुए किसी भी जीव जन्तु को कष्ट देने, उन्हें मानसिक व शारीरिक प्रतारणा देने, यहाँ तक कि पक्षियों को पिंजरों में कैद करने तक को भी गुनाह बताया है । उनका कथन हैं कि इस्लाम तो पेड़ों को काटने तक की भी इजाजत नहीं देता ।

इमाम साहब ने अपनी पुस्तक के पृष्ठ न. 18 पर हजरत मोहम्मद साहब का कथन इस प्रकर दोहराया है यदि कोई इन्सान किसी बेगुनाह चिड़िया तक को भी मारता है तो उसे खुदा को इसका जवाब देना होगा और जो किसी परिन्दे पर दया कर उसकी जान बचाता है तो अल्लाह उस पर कयामत के दिन रहम करेगा इमाम साहब स्वयं भी शाकाहारी है व सबको शाकाहार की सलाह देते है ।
कहने का आशय सिर्फ इतना है कि किसी भी दिव्य पुरुष ने कभी भी जीव हत्या को जायज़ नहीं ठहराया है।
चाहे वह किसी भी धर्म सम्प्रदाय से क्यों न जुड़े हों।
ख़ैर,
एक बहुत ही साधारण सी बात यह है कि मांस मदिरा निकृष्ट जीव अर्थात शैतानों और राक्षसों का भोजन है और राक्षसों का भोजन करके आप राक्षसी गुण ही पायेंगे यदि वास्तव में आप इंसानियत के पुजारी हैं तो आपको इसी क्षण प्रण ले लेना चाहिये कि आप आज से मांस मदिरा नहीं खायेंगे....
अब आप अपने आहार के आधार पर स्वयं यह मूल्यांकन कर सकते हैं कि आप मनुष्य हैं या राक्षस,,,आपके बच्चे मनुष्य है या राक्षस,,आपका वंश और खानदान इंसानियत का है या शैतानों का..बाक़ी आप समझदार हैं......
ख़ैर जो हमारा चिंतन है उसके आधार पर मांस का सेवन करने वाला कोई भी जीव न ईश्वर का प्यारा है और न अल्लाह का उसे हम सिर्फ और सिर्फ उस श्रेणी में रखते हैं जिस श्रेणी पर सिर्फ तरस किया जा सकता है,,,रहम भी नहीं क्योंकि ईश्वर रहम सिर्फ़ नेक दिल बंदों पर ही करता है..

        सादर,,,,
             सिद्धार्थ अर्जुन

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